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Learn the secret of yoga from Hatha Yoga Pradeepika

योग की प्रायोगिक क्रियायें

इस अध्याय में योगसूत्र एवं हठयोग प्रदीपिका के द्वारा योग की प्रायोगिक क्रियाक्रियाओं की विवेचना एवं समीक्षा प्रस्तावित है।
इस पर विचार करने के लिए इस अध्याय को तीन खण्डों में विभाजित किया गया है:
अ. योगसूत्र में योग की प्रायोगिक क्रियायें।
ब. हठयोग में योग की प्रायोगिक क्रियायें।
स. योगसूत्र एवं हठयोग में योग की प्रायोगिक क्रियाओं की तुलना एवं समीक्षा।

खण्ड (अ)

योगसूत्र में योग की प्रायोगिक क्रियायें प्रायोगिक क्रियाक्रियाओं का तात्पर्य प्रयोग में लायी जाने वाली क्रियाविधि से है। योगसूत्र में योग साधना बतायी गयी है। उसमें योग के आठ अंग अभ्यास के लिए बताये गये हैं, परन्तु उन अंगों की अवधारणा तो प्राप्त होती है, उनकी विधियाँ प्राप्त नहीं होती है। फिर भी यदि उनकी टीकायें देखें तो उनके कुछ ग्रन्थों में क्रियाओं की चर्चा प्राप्त होती हैं, जो हठयोग ग्रन्थों की
ही विधि को बतलाता है। अतः योगसूत्र से अवलोकन से हमें यह ज्ञात होता है कि वहाँ पर योग साधना के सिद्धान्त का पालन करने का निर्देश है न कि प्रायोगिक क्रियाओं का। इन्हीं योग की साधना का वर्णन हम पूर्व के अध्याय में कर आये हैं। अतः हम इस अध्याय के खण्ड (ब) में हठयोग के दोनों महत्वपूर्ण ग्रन्थ हठयोग प्रदीपिका एवं घेरण्ड संहिता में वर्णित योग की प्रायोगिक क्रियाक्रियाओं का विवरण प्रस्तुत करेंगे।

खण्ड (ब)

हठयोग में योग की प्रायोगिक क्रियायें। हठयोग प्रदिपिका में योग की प्रायोगिक क्रियाओं के अन्तर्गत आसन, प्राणायाम, मुद्राबंध  आदि का वर्ण न प्राप्त होता है, प्रस्तुत अध्याय में हठयोग प्रदीपिका में वर्णित आसन, प्राणायाम एवं मुद्रा की विधियों एवं उनके लाभ का विवरण दिया गया है। सर्वप्रथम हठयोग प्रदीपिका में वर्णित पन्द्रह आसनों का विवरण दिया जा रहा है, जो इस प्रकार है:

स्वास्तिक आसन

भारतीय संस्कृति में स्वास्तिक को कल्याणकारी माना है। इसलिए कोई कार्य शुरू करने से पहले स्वस्तिक (ब्रह्म) को याद करते है। इसलिए स्वस्तिक की स्वीकारते हुए वसिष्ठ, स्वात्माराम ने इसे प्रथम स्थान पर रखा है। इस आसन का वर्ण न हठयोग प्रदीपिका, घेरण्ड संहिता में समान है।
दोनों पैरों की एड़ियों को जंघाओं के मध्य में स्थापित करके सीधे बैठने की स्थिति को स्वास्तिकासन कहा जाता है। ‘‘दोनो पैरों के सलुक्रियाओं को घुटनों और जंघों के मध्य में सम्यक् प्रकार से रखकर शरीर को सीधा रखते हुए सन्तुलित बैठना ही स्वस्तिकासन है।‘‘ इस आसन के करने से पैरों के तलुओं को बहुत लाभ मिलता है। जिन व्यक्तियों के पैरों में दुर्गन्ध, पसीना और दर्द  ठीक होता है। यदि इस आसन को लगातार 40 दिन तक अभ्यास किया जाये तो पैरों के तलवों में असीम बल प्रवेश करता है। जिन व्यक्तियों के पैरों में दर्द होता हो, उन्हें यह आसन प्रतिदिन 15 मिनट करना चाहिए।

गोमुखासन (Gomukhasna)

गोमुखासन को करते समय साधक के शरीर की आकृति गाय के मुख के समान बनती है, इसलिए इस आसन को गोमुखासन कहा गया है। इस आसन को करते समय दाहिने पैर की दायें भाग में रखकर गाय के मुख के समान आकृति बनने से गोमुख आसन बनता है। इस प्रकार ‘‘दाहिनी एड़ी को कटि के वाम भाग में तथा उसी प्रकार बायें (एड़ी) को (कटि के) दायें भाग में रखकर गाय के मुख के समान आकृति बनाने से गोमुखासन होता है।‘‘

गोमुखासन करने से फेफड़ों से सम्बन्धित सभी रोगों का नाश होता है। पैरों, जंघाक्रियाओं तथा घुटनों के लिए यह आसन अत्यन्त ही उपयोगी माना जाता है। इस आसन के अभ्यास से मनुष्य को कभी भी दमा और क्षय रोग नहीं होते हैं साथ ही इस आसन को ब्रह्ममूहुर्त में करने से रक्त की शुद्धि होती है।

वीरासन (Veerasan)

वीरासन का तात्पर्य  होता है वीरों की भांति बैठना। जब दक्षिण पाद को बायीं जंघा पर तथा बायें पाद को दायीं जंघा पर उचित प्रकार से स्थापित किया जाता है, तो उसे वीरासन कहा जाता है। अतः ‘‘एक पांव को दूसरी जंघा पर तथा दूसरे पांव को अन्य जंधा के नीचे रखने से वीरासन होता है।‘‘

इस आसन के द्वारा चित्त की एकाग्रता में वृद्धि होती है। जंघाक्रियाओं तथा पिण्डलियों को असीम बल प्राप्त होता है। कुछ योगियों के अनुसार यदि इस आसन को खड़े होकर किया जाये तो यह अत्यन्त ही लाभकारी है।

कूर्मासन (Kurmasna)

इस आसन में दोनों पाँव की एड़ियों से गुदा को विपरीत भाग को दबाकर बैठा जाता है। अर्थात्, जब दायें पैर के टखने से गुदा के वाम भाग को तथा वाम टखने के द्वारा गुदा के दायें भाग को दबाकर बैठा जाता है, तब कूर्मासन होता है। इस प्रकार, ‘‘दोनों टखनों से गुहा प्रदेश को विपरित एकं पाद तथैवस्मिन्यिसेदुरूणि स्थितम। इतरस्मिस्था चोरू वीरासनमितीरितम्।। हठप्रदीपिका, 1/21।
 
क्रम से रोककर समाहित रूप से बैठने पर योगवेत्ताओं के कथनानुसार कूर्मा सन होता है।‘‘ इस आसन के द्वारा पेट, घुटने तथा जंघा से सम्बन्घित सभी रोगों का नाश होता है। बवासीर जैसे रेग नष्ट हो जाते हैं तथा श्वॅस-प्रश्वास की गति सामान्य रहती है। यदि इस आसन के अभ्यास के समय साधक पीछे की ओर झुक जाये तो मेरुदण्ड लचीला होता है, जठराग्नि की वृद्धि होती है तथा कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है।

कुक्कुटासन (Kukkutasna)

जब पद्मासन लगाकर दोनों हाथों को घुटनों और जंघाओं के मध्य से निकालकर दोनों हाथों के पंजों को भूमि पर स्थापित कर देने के पश्चात् सम्पूर्ण शरीर को हाथों पर उठाकर कुछ देर तक रुकने को कुक्कुटासन कहा जाता है। इस प्रकार, ‘‘पद्मासन लगाकर जंघाओं के मध्य भाग में दोनोहाथों को लगा कर तथा उनहाथों को पृथ्वी में टिकाकार आकाश में स्थित रहने से कुक्कुटासन होता है।‘‘ जिन व्यक्तियां के हाथों में कम्पन्न होता हो, उन्हें यह आसन अवश्य करना चाहिए। इस आसन के द्वारा जठराग्नि प्रदीप्त होती है, शरीर में स्थिरता आती है, हथेलियाँ दृढ़, मणिबन्ध सुदृढ़ होता है। इसके अतिरिक्त इस आसन के अभ्यास के द्वारा दोनों हाथों एवं पैरों के साथ पिण्डलियों को असीम बल प्राप्त होता है तथा वक्षस्थल भी पुष्ट होकर फैलता है। 
गुदं निरूद्वय गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमण सयाहितः। कूर्मासनं भवदेतदिति योगविदो विदुः।।
हठप्रदीपिका, 1/22।  पद्मासनं तु संस्थाप्यां जानूर्वोरंतरे करौ। निवेश्य भूमौ संस्थप्य व्योमस्थं कुक्कुटासनम्।।
हठप्रदीपिका, 1/23।
 

उत्तान कूर्मासन (Uttan Kurmasna)

इस आसन में जमीन पर कमर को लगाकर दोनों हाथों से गले को पकड़कर कछुए के समान उल्टा लेट जाने को उत्तान कूर्मासन कहते हैं। अतः ‘‘उक्त कुक्कुटासन का बन्धन लगाकर ग्रीवा को दोनांभुजाओं से बाँध
ले और कछुए के समान सीधा हो जाय तो उत्तान कूर्मासन हो जाता है।‘‘ इस आसन के अभ्यास के द्वारा कमर पतली, सीना चैड़ा तथा मेरुदण्ड लचीला होता है। इस आसन को यदि ब्रह्ममूर्हुत में किया जाये तो शरीर की दुर्गन्ध समाप्त हो जाती है तथा गर्दन में उत्पन्न होने वाले सभी विकार दूर हो जाते हैं। यह आसन अन्य आसनों से इसलिए अधिक महत्वपूर्ण  है क्योंकि यह शरीर को साधने वाला आसन है।

धनुरासन (Dhanurasna)

धनुरासन का अर्थ है धनुष जैसा आकार बना लेना। इस आसन में पेट के बल जमीन पर लेटकर, घुटनों से दोनों पावों को मोड़कर तथा दोनों पैरों के अंगूठों को दोनोंहाथों से पकड़कर कानों तक दानों पैरों के पंजों को खींचकर लाने के बाद शरीर की आकृति को धनुष के समान बना लेने पर धनुरासन कहा जाता है। स्वात्माराम योगी के अनुसार, ‘‘दोनों पाँवों के अँगूठों को हाथों से ग्रहण करके धनुष के समान कान तक खींचे, वह धनुरासन कहलाता है।‘‘
 कुक्कुटासनबंधस्थो दोभ्र्यां सन्ध्य कन्धराम। भवेत्कूर्मवदुत्तान एतदुत्तानकूर्मकम्।।
हठप्रदीपिका, 1/24। पादंगुष्ठौ पाणिभ्यां गृहीत्वा श्रवणावधि। धनुराकर्षणं कुर्यांद्वनुरासमुच्यते।। हठप्रदीपिका, 1/25।

इस आसन के द्वारा जठराग्नि प्रदीप्त होती है तथा उदर सम्बन्धित सभी प्रकार के रोगों का निवारण होता है। इस आसन का अभ्यास स्त्रियों के लिए अधिक उपयोगी है। इस आसन के द्वारा शरीर की चर्बी  कम होती
है तथा गर्द न का दर्द  खत्म होता है।

मत्स्येन्द्रासन (Matsyendrasna)

मत्स्येन्द्र ऋषि इसी आसन में बैठा करते थे इसी कारणवश इस आसन का नाम मत्स्येन्द्रासन कहा गया। जब दाहिने पैर को वामजंघा के मूल में रखकर तथा दाहिने पैर के घुटने के ऊपर बाएं पैर को रखते हुए दाएं पैर के घुटने के पास बाएं पैर की एड़ी को रखने के पश्चात् दायें हाथ से बाएं पैर के घुटने को बगल से दबाते हुए अंगूठे को पकड़ने के बाद बाएं कन्धे की तरफ गर्दन को घुमाया जाता है, जिससे मत्स्येन्द्रासन पूर्ण  होता है। इस प्रकार, ‘‘दाहिने पांव को बायीं जंघा के मूल में रखकर और बायें पांव को (दाहिने) घुटने के बाहर से घेरते हुए शरीर को ऐठन देकर मोड़े। तब विपरीतहाथों से दोनों पांव को पकड़कर स्थिर रखना चाहिए। यह श्री मत्स्येन्द्रनाथ का कहा हुआ आसन है।’’

इस आसन को करने से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होती है, अभ्यासी की जठराग्नि में वृद्धि होती है तथा साधक को अनेक प्रकार के रोगों से मुक्ति प्राप्त होती है।
वामोरूमूलार्पितदक्षपादं जानोर्ब हिर्वेष्टितपत्रवामपादम्। प्रगृह्य तिष्ठेत्परिवर्ति ताग्डः श्रीमत्यनाथोदितमासनं स्यात्।। हठप्रदीपिका, 1/26।
 

पश्चिमोत्तान आसन (Padpashchimottasna)

पश्चिमोत्तान से तात्पर्य  है शरीर के पश्चिम हिस्से में खिंचवा देना। भूमि पर दोनों पैरों को दण्ड के समान सामने फैलाकर दोनों हाथों के द्वारा दोनों पैरों के अंगूठों को भली प्रकार से पकड़कर अपने घुटनों पर मस्तक को लगाते हुए शरीर को अधिक आगे की ओर खींचकर कुहनियाँ जमीन पर लगा देने से पश्चिमोत्तान आसन कहा जाता है। ‘‘दोनों पांव को भूमि पर दण्ड के समान फैलाकर, हाथों से दोनों अंगूठों को पकड़कर, घुटनों पर मस्तक लगाकर रखने से पश्चिमाेत्तान आसन कहलाता है।’’ यह आसन सभी आसनों में अग्रणी माना जाता है। इस आसन का
अभ्यास करने से भूख बढ़ती है, उदर पतला होता है तथा शरीर सभी रोगों से मुक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त इस आसन के द्वारा मोटापा कम होता है, रीढ़ की हड् डी, नसों व मांसपेशियों में रक्त का संचार होता है तथा
मस्तिष्क का तनाव दूर होता है।

मयूरासन (Mayurasna)

इस आसन में शरीर की आकृति मयूर के समान हो जाती है। इस आसन में दोनों हाथों को भूमि पर भली प्रकार से स्थापित करके नाभि को दोनों कुहनियो पर लगाकर सम्पूर्ण शरीर अर्थात् मस्तक से लेकर पांव तक अधर में उठाने को मयूरासन कहा जाता है। हठप्रदीपिका के अनुसार, ‘‘दोनों हाथों से पृथिवी का सहारा लेकर और मणि बन्धों के ऊपर नाभि के पाश्र्वद्वय के भागों को स्थापित करे। इस प्रकार दण्ड के समान उच्च आसन
होता है, इसे मयूरासन कहते है।’’

इस आसन को अत्यधिक कठिन आसन कहा जाता है। इस आसन को करने से वात-पित्त-कफ आदि दोष समाप्त होते हैं। इसके निरन्तर अभ्यास से कुहनियों, हथेलियों और मणिबन्धों को अधिक बल प्राप्त होता है।
उदर सम्बन्धी सभी रोगों के निवारण के साथ-साथ शरीर का कम्पन्न नष्ट होता है।

शवासन (Shawasna)

शव से तात्पर्य मृतक शरीर से है। इस आसन में पीठ के बल सीधा लेटना चाहिए। दोनों पैरों मेंदो फुट का अन्तर रखते हुए पंजे बाहर तथा एड़ी अन्दर की तरफ रखना चाहिए। इस आसन में हथेलियों को ऊपर की ओर रखना चाहिए। ग्रीवा तथा सिर भूमि पर सीधी टिकी होनी चाहिए। एक बार स्थिर हो जाने के पश्चात् शरीर को हिलाना नहीं चाहिए। ‘‘पीठ को शव के समान धरती पर लगाकर सीधा सो जाय यह शवासन है। इससे श्रम का शमन होता और चित्त को विश्राम मिलता है।’’
इस आसन के अभ्यास के द्वारा परिश्रम दूर होता है तथा चित्त की चंचलता नष्ट होती है। इस आसन को करने से रक्तचाप, नाड़ी दौबल्र्य, हृदय रोग तथा मस्तिष्क सम्बन्धी रोगों में लाभ प्राप्त होता है।
 धराभवष्टभ्य करद्वयेन तत्कपूरस्थापितनाभिपाश्र्वः। उच्चासनो दंडवदुत्थितः
स्यान्मायूरमेतत्प्रवदंति पीठम्।। हठप्रदीपिका, 1/30।
उत्तानं शववदृभूमौ शयनं तच्छवासनम्। शवासनं श्रंातिहरं चित्तविश्रांतिकारकम्।।
हठप्रदीपिका, 1/32। 

सिद्धासन (Siddhasna)

इस आसन के अभ्यास के लिए बाएं पैर की एड़ी को गुदा तथा उपस्थ के मध्य में दृढ़तापूर्व क दूसरे पैर की एड़ी को उपस्थ के ऊपर रखकर ठाेड़ी को हृदय पर भली प्रकार स्थापित कर इन्द्रियों को संयमित करके भू्रमध्य में दृष्टि लगाना चाहिए। ‘‘योनि स्थान से बाँये पाँव की एडी को मिलावे और दाँये पाँव को लिंगेन्द्रिय के ऊपर से दृढता से रखें तथा हृदय के निकट ठोड़ी को ठीक से रखे। ऐसा निश्चल योगी अपनी एक रस दृष्टि से भौंहो के मध्य में देखें। यह अभ्यास मोक्ष-मार्ग  में लगे हुए कपाट को खोलने वाला सिद्धासन कहलाता है।’’ इस आसन को समस्त आसनों में महत्वपूर्ण  माना जाता है। इसके अभ्यास के द्वारा उन्मनी कला जागृत होती है। साधक का प्राणवायु केवल कुम्भक में बन्ध जाता है। इसे मोक्ष के कपाट को खोलने वाला आसन भी माना जाता है।

पद्मासन (Padmasna)

पीठ पर दायाँ हाथ ले जाकर बाँयी जँघा पर स्थित दायें पांव के अंगूठे को पकड़कर इसी प्रकार बायें हाथ को पीठ की ओर ले जाकर बाँयें पाँव के अंगूठे को पकड़कर उसी अंगूठे से टोड़ी को हृदय के निकट चार अंगुल की दूरी पर रखकर दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर स्थिर करने से पद् मासन की सिद्धि होती है। ‘‘बाँयी जँघा पर बाँये पाँव को ठीक प्रकार सीधा रखकर तथा वैसे ही दायेंपाँव को जांघ के ऊपर भली प्रकार रखें और पृष्ठ भाग की विधि से दानों पॅाव के अँगूठों के हाथों से पकड़ ले फिर ठोड़ी को हृदय पर रख कर दृष्टि को नासिका के अग्र भाग पर स्थित करे। यह रोगों को नाश करने वाला पद्मासन कहलाता है। इस आसन को सभी रोगों का नाशक माना जाता है।

सिंहासन (Singhasna)

इस आसन के अभ्यास के लिए बाई एड़ी को दाहिने पाश्र्व  में तथा दायी एड़ी को वाम पाश्र्व में स्थापित करके दोनों हाथों को घुटनों के बराबर रखकर सभी अंगुलियों को फैलाकर मुख को खोलकर अपनी दृष्टि को नासाग्र भाग पर स्थिर रखना सिहासन कहलाता है। इस प्रकार, ‘‘अण्डकोशों के नीचे सींवनी पर नाड़ी के दोनों पार्श्वों में टखनों को लगावे तथा दाये पाश्र्व में बाँया टखना और बांये पाश्र्व में दाँया टखना लगााना चाहिए।
जानुओं के ऊपर हाथों के तलवे ठीक प्रकार से लगावें और हाथों की अँगुलियों को फैलाकर मुख को फैलाकर मुख को भी फैलाले और नासाग्र में दृष्टि लगाले। योगियों में श्रेष्ठ साधक द्वारा पूजित यह सिंहासन तीनों बंधों
का संधान करने वाला और उत्तम माना गया है।‘‘
इस आसन को ब्रह्मचर्य के लिए सर्वश्रेष्ठ आसन स्वीकार किया गया है। मुख को खोलने के कारण यह जीहृवा तथा गले के लिए उपयोगी माना जाता है। इस आसन के द्वारा नेत्र की ज्योति की वृद्धि के साथ साथ शरीर
में असीम बल की भी वृद्धि होती है।

भद्रासन (Bhadrasna)

इस आसन में पैरों की  एड़ियों को उपस्थ अंगों के नीचे सीवनी नाड़ी के पाश्र्व भाग में इस प्रकार स्थित करना चाहिए जिससे वाम एड़ी सीवनी नाड़ी के वाम भाग में और दाहिनी एड़ी सीवनी नाड़ी के दाहिने भाग पर आ जाये। इसके पश्चात् अपने दोनों हाथों से पैरों को भली प्रकार से पकड़कर स्थिर रहना चाहिए। हठप्रदीपिका के अनुसार, ‘‘अण्डकोशों के नीचे सीवन नाड़ी के दोनों पाश्र्व भागों टखनों को इस प्रकार रखें कि बाँया टखना बाँये पाश्र्व में और दाँया टखना दाँयें पाश्र्व में लगालें । फिर सीवनी पार्श्वों में गये हुएपाँवों को हाथों से बाँधकर दृढ़ और स्थिर करे तो यह सभी व्यक्तियों को नष्ट करने वाला भद्रासन हो जायेगा।‘‘ यह आसन सभी रोगों को दूर करने वाला है।
हठयोग प्रदीपिका के अनुसार उपरोक्त पन्द्रह आसनों का तथा उनके लाभ का वर्णन किया गया है। स्वात्माराम योगी के अनुसार इन आसनों के द्वारा व्यक्ति को स्वस्थ, निरोगी जीवन की प्राप्ति होती है। इन आसनों की
व्याख्या के उपरान्त हठयोग प्रदीपिका के अनुसार प्राणायाम तथा उनके फल का वर्णन इस प्रकार किया जा रहा है: गुल्फौ च वृषणस्याधः सीवस्यः पाश्र्व योः क्षिपेत्। सव्यगुल्फतथा सव्ये दक्षगुल्फतु दक्षिणे।। हठप्रदीपिका, 1/53। पाश्र्वपादाच पाथिभ्यां दृढं बद्ध्वा सुनिश्चलम्। भद्रासनं भवेदेतत्सर्वव्याधि विनाशकम्।।
हठप्रदीपिका, 1/54।

धौति कर्म (Dhauti Karma)

चार अंगुल लम्बे कपड़े को जल में भिगोकर धीरे-धीरे गुरु के निर्देश के अनुसार निगलना चाहिए और इसी प्रकार पुनः धीरे-धीरे निकालना चाहिए। यह धौति कर्म है। इस प्रकार, ‘‘चार अंगुल चैड़ा, पन्द्रह हाथ लम्बा कपड़ा, जल में भिगोकर गुरु के निर्दे श के अनुसार धीरे-धीर निगलना चाहिए। पुनः इसे धीरे-धीरे बाहर निकालना चाहिए, इसे
धौति-क्रिया कहते हैं।‘‘ इस धौति कर्म के द्वारा कफ के विकार दूर होने के साथ ही साथ खाँसी, जुकाम, श्वास इत्यादि दोषों से भी मुक्ति प्राप्त होती है। ‘‘धौति क्रिया के फलस्वरुप खाँसी, दमा, तिल्ली, कुष्ठ तथा अन्य बीसों प्रकार के कफ-सम्बन्धी रोग निस्सन्देह नष्ट हो जाते हैं।‘‘

वस्ति कर्म (Vasti Karma)

बाँस की छः अंगुल लम्बी नली को गुदामार्ग में प्रविष्ट करें तथा दो अंगुल नली को बाहर ही रहने दें। इसके पश्चात उत्कटासन लगाकर जल में प्रविष्ट होकर आकुंचन करे अर्थात् नौली कर्म द्वारा उदर में चलाकर निकाले। अतः ‘‘नाभिपर्यन्त जल में स्थित हो गुदा में एक नली डालकर उत्कटासन करते हुए साधक गुदा का संकोचन करे ं और अन्दर के भाग को धोयें। इसे बस्ति क्रिया कहते हैं।‘‘  धौति और वस्ति क्रिया दोनों को ही भोजन से पूर्व ही करना चाहिए तथा इस क्रिया को करने के उपरान्त भोजन कर लेना चाहिए। इस कर्म  को करने से काया रोग रहित रहती है। हठप्रदीपिका के अनुसार, ‘‘बस्ति क्रिया के अभ्यास के फलस्वरुप वायुगोला, तिल्ली, जलोदर तथा वात-पित्त-कफजन्य सभी दोष नष्ट हो जाते हैं।’’

नेति कर्म (Neti Karma)

सूत्र के एक टुकड़े को चिकना करके नाक से घुसाकर मुख के द्वारा निकाल लें। यह अणिमा आदि गुणों से सम्पन्न अथवा सिद्धों के द्वारा बताया गया कर्म कहलाता है। इस प्रकार, ‘‘चिकने और लगभग 9 इंच लम्बे सूत्र को नासिका में डालकर उसे मुख से बाहर निकालें। इसे ही योगीजन नेति कहते हैं।‘‘
इस नेति कर्म के द्वारा कपाल का शोधन होता है इसके अतिरिक्त नासानाल आदि का भी शोधन होता है। अतः ‘‘यह नेति क्रिया कपाल प्रदेश को शुद्ध करती है, दिव्य दृष्टि प्रदान करती है और स्कन्ध प्रदेश से ऊपर होने वाले रोगसमूहों को शीघ्र नष्ट करती है।‘‘

त्राटक कर्म (Tratak Karma)

त्राटक कर्म  के अनुसार योगी को चित्त को एकाग्र करके किसी भी सूक्ष्म पदार्थ नर अपनी दृष्टि को दृढ़ता से जमाकर तब तक देखना चाहिए जब तक नेत्रों से आँसू न निकल जायें। अतः ‘‘स्थिरदृष्टि से किसी सूक्ष्म लक्ष्य को एकाग्र होकर तब तक देखना चाहिए जब तक कि आँखों से आँसू बाहर न आ जाये। आचार्यो ने इसे त्राटक कहा है।‘ त्राटक कर्म के द्वारा नेत्र के रोगों का नाश, तन्द्रा, आलस्य आदि रोगों का नाश होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार इससे साधक को सम्मोहन शक्ति भी प्राप्त होती है।
‘‘त्राटक नेत्र रोगों को दूर करता है, तथा तन्द्रा आदि को नहीं आने देता। अतः इस त्राटक को सोने की पेटी के समान महत्व देकर इसकी रक्षा करनी चाहिए।’’

नौलि कर्म (Nauli Karma)

कन्धे को था ेड़ा आगे की ओर झुकाकर तीव्र भंवरे के समान वेग से अपने उदर को दायी-बायी ओर घुमाने पर नौलि कर्म होता है। इस प्रकार, ‘‘कन्धे को थोड़ा आगे की ओर झुकाकर तीव्र गति चाले भँवर के समान उदर को दाहिने से बायें और बायें ये दाहिने ओर घुमाना चाहिए। सिद्धों के द्वारा इसे ही नौलि कहा जाता है।’’ इस कर्म के द्वारा वातादि सभी विकारों का नाश होता है। मन्द जठराग्नि को प्रदीप्त करता है तथा पाचन-क्रिया आदि तेज होती है। ‘‘सदा-सर्वदा आनन्द को लानेवाली यह नौलि-क्रियामन्द जठराग्नि को प्रदीप्त कर पाचन-क्रिया आदि को तेज करती है, विविध दोषों तथा रोगों को नष्ट करती है। यह हठक्रियाओं में श्रेष्ठ  है।’ 

कपाल भांति कर्म (Kapaal Bhati Karma)

लोहार के द्वारा किये जाने वाले चर्म की भाथी के समान जो रेचक पूरक होता है उसे कपाल भांति कहा जाता है। अतः ‘‘लुहार की धौंकनी समान शीघ्रता से रेचक-पूरक करने से कपालभाति होती है। यह कफ-रोगों को नष्ट करने वाली है।’’ इस कपालभाति कर्म  के द्वारा कफ सम्बन्धी दोष, मुटापा इत्यादि का नाश होता है। इस प्रकार इन छः प्रकार के कर्मों को करके प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए। ‘‘मुटापा, कफ-सम्बन्धी रोग तथा मल आदि का षट् क्रियाक्रियाओं द्वारा निवारण कर, तब प्राणायाम करना चाहिए। इससे प्राणायाम अनायास ही सिद्ध होता है।‘‘
इस प्रकार इन छः प्रकार की क्रियाओं का जीवन में अत्यधिक महत्व है। रोगों में षट्कर्मों का अभ्यास अत्यन्त लाभकारी होता है तथा इन षट्कर्मों का नियमित अभ्यास करने से अनेक रोग जीवन में नहीं आते हैं।
‘‘स्थूलता और कफ जिसे अधिक हो, उसे पहले छः शोधन क्रियायें करनी चाहिए किन्तु जिनमें त्रिदोषों (वात-पित्त-कफ) की समानता हो, उन्हें इन क्रियाओं के अभ्यास करने की विशेष आवश्यकता नहीं। धौति, वस्ति, नेति, त्राटक, नौलि एवं कपालभाति के छः शोधन क्रियायें कहे गये हैं। शरीर को शुद्ध करने वाली तथा आश्चर्य जनक फल देने वाली ये छः क्रियायें गोपनीय रखनी चाहिए। इसलिए योगीराजों द्वारा इन्हें बहुत महत्व दिया गया।’’
 
प्राण जीवन की शक्ति है तथा यह सर्वव्यापक ऊर्जा का मूल है। प्राण की शक्ति के कारणवश ही हमारे कान का सुनना, आँख का देखना, नासिका का सूंघना, तथा मस्तिष्क तथा बुद्धि आदि का कार्य सम्पादित हो पाता है। प्राणायाम का मुख्य लक्ष्य होता है प्राण और अपान को एक करना प्राणायाम के प्रभाव के कारण ही सोती हुई कुण्डलिनी का जागरण हो पाता है। हठयोग में आठ प्रकार के प्राणायामो का उल्लेख प्राप्त होता है। ‘‘कुम्भक आठ प्रकार के होते है- 1 सूर्यभेदन 2 उज्जायी 3 सीत्कारी 4 शीतकारी 5 भस्त्रिका 6 भ्रामरी 7 मूर्छा और 8 प्लाविनी।‘‘28 इन प्राणायामों का वर्णन इस प्रकार है:

सूर्यभेदन (SuryaBhedan)

सूर्य का अर्थ है: पिंगला तथा भेदन का अर्थ है: तोड़ना। सूर्य भेदन प्राणायाम में बार-बार पिंगला नाड़ी के द्वारा श्वास लेने को इसे सूर्यभेदन प्राणायाम कहा जाता है। सूर्यभेदन प्राणायाम करने के लिए सर्वप्रथम किसी ध्यानात्मक आसन पर बैठकर कमर मेरुदण्ड को सीधा करें। दायी अनामिका के द्वारा बायीं नासारन्ध्र को बन्द करें। दायीं नासारन्ध्र से बिना किसी भी प्रकार की ध्वनि किए श्वास भरे। अधिक से अधिक वायु को भीतर लेकर दीर्घ  श्वसन करें। ठोड़ी से वक्ष पर दबाव डालते हुए जालन्धर बन्ध को लगायें। तत्पश्चात ् धीरे-धीरे जालन्धर बन्ध को हटाकर नियन्त्रित गति से रेचक करें। ‘‘योगाभ्यासी कोई भी सुखदायक आसन बिछाकर, उस पर आसन लगाकर, दाहिने नथुने से बाहरी वायु को धीरे-धीरे अन्दर खींचकर, उसे जब तक हो सके अधिकाधिक निरोध करें। (श्वास को रोंके) और फिर बायें नथुने से श्वास को छोड़े।‘‘  इस प्रकार से सूर्यभेदन प्राणायाम करने से कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है, कफ दोष दूर होते हैं, मोटापा कम होता है तथा यह क्षय तथा मृत्यु को दूर करता है।

उज्जायी (Ujjayi)

उज्जायी प्राणायाम करते समय पद् मासन में मेरुदण्ड को सीधा करते हुए ज्ञान मुद्रा में बैठे। दोनों नासिका से समान गति से हृदय से कण्ठ पर्य न्त श्वास को अन्दर लेकर कुंभक तथा जालन्धर बन्ध लगायें। तत्पश्चात लन्धर बन्ध को खोलकर दोनों नासिका के द्वारा सम की आवाज करते हुए रेचक करने से उज्जायी प्राणायाम होता है। ‘‘मुख को बन्द कर दोनों नथुनों से वायु को कुछ आवाज के साथ धीरे-धीरे इस प्रकार लेना चाहिए, जिससे कण्ठ से लेकर हृदय प्रदेश तक इसके स्पर्श का अनुभव हो।‘‘
उज्जायी प्राणायाम के द्वारा जठराग्नि बढ़ती है, साधक को कफ, रक्त, जुकाम, बुखार इत्यादि रोग नहीं होते तथा इससे सिर की गर्मी  दूर होने के अतिरिक्त अभ्यासी आकर्षक भी होता है।

सीत्कारी (Sitkari)

इस प्राणायाम में सीत की आवाज करते हुए करने के कारण इस प्राणायाम को सीत्कारी प्राणायाम कहा जाता है। सर्वप्रथम ध्यानात्मक आसन में बैठकर मेरुदण्ड को सीधा रखकर ज्ञानमुद्रा में बैठे। होंठ को खोलकर दाँतों को एक दूसरे के ऊपर दबाकर सी-सी की आवाज करते हुए मुँह से श्वास लें तथा ‘त‘ के साथ कुम्भक करते हुए जालन्धर बन्ध को लगायें तत्पश्चात् कुम्भक करने के बाद जालन्धर बन्ध खोलकर नासिका से रेचक करने के बाद सीत्कारी प्राणायाम हुआ। ‘‘मुख से सीत्कार (सी-सी की आवाज) करते ह ुए पूरक करना चाहिए और रेचक केवल नासिका से ही करनी चाहिए। इस प्रकार से अभ्यास करते हुए (साधक) दूसरा कामदेव जैसा हो जाता है।’’31 इस प्राणायाम को करने से साधक के सौन्दर्य एवं बल में वृद्धि होती है। क्षुधा, तृष्णा, निद्रा, आलस्य, मुंह का छाला, पायरिया, इत्यादि में लाभकारी होता है।

शीतली (Sitli)

सम्पूर्ण शरीर में शीतलता तथा प्रसन्नता का अनुभव कराने के कारण इस प्राणायाम को शीतली कहा जाता है। ध्यानात्मक आसन में बैठकर मेरुदण्ड को सीधा रखें। जीभ को बाहर निकालकर उसे लम्बाई में मोड़ें।
सी की ध्वनि करते हुए जिहृवा के अग्र भाग से श्वास को खींचे तत्पश्चात कुम्भक और जालन्धर बन्ध लगायें। कुछ क्षणों के बाद जालन्धर बन्ध को छ़ोड़कर दोनों नासिका के द्वारा श्वास को बाहर निकालने पर शीतली प्राणायाम होता है। ‘‘जीभ (को दोनों ओर से मोड़कर, परनाले की तरह विशेष स्थिति में लाकर, फिर उस) के द्वारा वायु अन्दर खींचकर पहले के तरह कुम्भक का अभ्यास करना चाहिए। पश्चात् बुद्धिमान (साधक) को धीरे-धीरे नासिका छिद्रों द्वारा वायु का रेचन करना चाहिए।‘‘ शीतली प्राणायाम के द्वारा मन को शान्ति मिलती है तथा चिड़चिड़ापन दूर होता है। रक्त के शोधन और भूख-प्यास, ज्वर, पित्त आदि सभी प्रकार के रोगों के प्रभाव को नष्ट करने में यह प्राणायाम अधिक लाभकारी सिद्ध होता है। इस प्रकार, ‘‘यह शीतली नामक कुम्भक वायुगोला, तिल्ली, ज्वर, पित्त, भूख, प्यास, आदि सभी प्रकार के रोगों तथा विष के प्रभाव को भी नष्ट करता है।‘‘

भस्त्रिका (Bhastrika)

भस्त्र से तात्पर्य लुहार की छोटी धौंकनी से है। इस प्राणायाम की प्रक्रिया धौंकनी के समान होने के कारण इसे भस्त्रिका कहा जाता है। पद्मासन में बैठते हुए कमर को सीधा रखकर दोनों हाथों को घुटनों पर रखना चाहिए। चित्त को एकाग्र रखकर लुहार की धौंकनी के समान बार जल्दी-जल्दी श्वास छोड़े तथा लें। इसके बाद दायीं नासिका से श्वास लेकर बायीं से छोड़कर शान्त बैठते हैं। ‘‘यह भस्त्रिका वात-पित्त-कफजन्य विकारों को दूर करती है तथा जठराग्नि प्रदीप्त करती है।‘‘  भस्त्रिका प्राणायाम के द्वारा नासिका तथा वक्ष के सभी रोगों का नाश हो जाता है, जठराग्नि प्रदीप्त होती है। यह अभ्यासी को कुण्डलिनी जागरण के योग्य बनाता है तथा प्राण को सुषुम्ना में स्थित तीनों ग्रन्थियों के भेदन योग्य बनाता है।

भ्रामरी (Bhramri)

भ्रमर से तात्पर्य है भंवरा। इस प्राणायाम में साधक के द्वारा गुंजन के समान आवाज करते हुए श्वास-प्रश्वास करने को भस्त्रिका प्राणायाम कहा जाता है। किसी भी प्रकार के ध्यानात्मक आसन में बैठने पर अपने दोनों हाथों की अंगुलियों के द्वारा दोनों कानों को बन्द करके पूरक करके रेचक को करते हुए भ्रमर के गुंजन के समान आवाज करने को भ्रामरी प्राणायाम होता है। अतः ‘‘वेग से भ्रमर-गुंजार के समान आवाज करते हुए पूरक करना चाहिए। तत्पश्चात् भ्रमरी के गुंजन के समान आवाज करते हुए धीरे-धीरे रेचक करना चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करने से साधकों के चित्त में एक अपूर्व  आनन्द-लीला की उत्पत्ति होती है।‘‘ इस प्राणायाम के द्वारा मन एकाग्र होता है, क्रोध, चिन्ता एवं अनिद्रा का निवारण होता है। आनन्द की प्राप्ति के साथ-साथ आवाज मधुर और मजबूत होती है।

मूर्छा (Murchha)

मूच्र्छा  का तात्पर्य होता है- बेहोश हो जाना। साधक के द्वारा विषय जगत की चेतना से मूच्र्छित हो लाने के कारण इस प्राणायाम को मूर्छा कहा जाता है। ध्यानात्मक आसन में बैठकर ज्ञान मुद्रा लगाने पर दोनों नासिका के द्वारा पूरक करके जालन्धर बंध को लगायें। कुछ समय के पश्चात कुम्भक करके जालन्धर बन्ध को छाड़कर रेचक करें। गले में घर्षण होने पर बार-बार घर्षण करते हुए रेचक-पूरक करें। 



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